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Friday, November 9, 2018

इस "जहर" का जिम्मेदार कौन? दिल्ली की प्रदूषित हवा पर विशेष रिपोर्ट

दिवाली बीत गयी, हर साल की तरह दिल्ली की प्रदूषित हवा पर खूब सियासत उठापटक हुयी| सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी दिल्ली-NCR में 200 टन से ज्यादा पटाखों की खपत हुयी| सियासत के लोग कहते हैं सिर्फ हिन्दुओ के त्यौहार पर पाबंधी लगायी जाती है| तो क्या हवा भी अब मजहब के नाम पर बाँट दी जाये? शायद राजनीतिज्ञ ये कर पायें|
air polution delhi
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार को हवा की गुणवत्ता नापने का सूचकांक 600 के पार पहुँच गया जिसे 50 से ज़्यादा नहीं होना चाहिए| 
लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? 2014 में  प्रदूषित हवा से १ लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हुयी जिसमे हर साल दुगना इजाफा हो रहा है|
मौजूदा केंद्र सरकार अपनी झोली भरने के लिए "सब्सिडी" छोड़ने का निवेदन कर सकती है| "किसान" लाभ का मोह दिखाकर "अतिरिक्त" टैक्स लगा सकती है, अपने पार्टी के फंड के लिए निवेदन कर सकती है लेकिन "धर्म विशेष" का वोट ना चला जाये इसलिए दिवाली पर पटाखे ना जलाने का निवेदन नही कर सकती| 
ज्ञात हो ये वही सरकार है जिसने २०१४ में विकास के नाम पर वोट माँगा था फिर २०१६ चुनाव की एक रैली में "कब्रिस्तान" से ज्यादा "श्मशान" होने चाहिए का सांप्रदायिक बयां दिया था| वैसे भी एक कथित "धार्मिक" राजनेता से ऐसे बयान की ही उम्मीद की जा सकती है| 

अब बात करते हैं दिल्ली की प्रदूषित हवा पर; दिल्ली के कई इलाके कारखानों से भरे पड़े हैं, लेकिन मजाल है वहा कभी क्वालिटी टीम पहुँच जाये और जांच कर ले की चिमनी है भी या नही? केजरीवाल जी तो हमेशा परेशां ही रहते हैं की केंद्र उन्हें काम नही करने देती लेकिन जो उनके हाथ में है वो भी तो नहीं करते क्योकि वही उनके वोट बैंक हैं| साहब को बीजेपी पर कमेंट करने के लिए बहुत वक़्त है, धडाधड ट्वीट करते हैं लेकिन जब अहम मुद्दों पर बात करनी होती है तो केंद्र पर इल्जाम लगा देते हैं| युवाओ को बहुत उम्मीद थी साहब से लेकिन आगे से शायद कोई भी "आप" जैसी पार्टी पर भरोसा ना कर पाए |  

ऐसा नहीं है की प्रदूषित हवा सिर्फ राजधानी में है, WHO की हाल ही में जारी 20 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहरों की लिस्ट में भारत के नौ शहरों को रखा है | है ना रोचक ?

जानिए कैसे बचने की कोशिश की जा सकती है?
एंटी-पल्यूशन मास्क, एयर-प्यूरीफ़ाइंग मशीनें काफी हद तक आपको बचा सकती है लेकिन उससे ज्यादा जरुरी है, मजहब से ऊपर उठकर, स्वयं से पहल करें| भारत के गौरव "प्रधानमंत्री" "श्री नरेन्द्र मोदी जी" के ओजपूर्ण भाषण सिर्फ वोट के लिए कारगर हैं| 

सभी मंत्रियों के पास इतना धन है की वो किसी टापू में शहर बसा सकते हैं लेकिन आम आदमी नहीं| 



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